बुधवार, 8 जून 2011

बोर्ड़ परीक्षा में विद्या मन्दिर श्रीकोट का शानदार प्रर्दशन

6 जून को घोषित वर्ष 2011 के उत्तराखण्ड बोर्ड़ परीक्षा परिणाम में सरस्वती विद्या मन्दिर श्रीकोट का शानदार प्रर्दशन रहा है। विद्यालय के चार भय्या/बहिनों ने उत्तराखंड की वरीयता सूची मैं अपना स्थान बनाया है. हाई स्कूल मैं बहिन प्रिया बर्त्वाल ने 90.40 प्रतिशत अंको के साथ 16 वां स्थान व भय्या राहुल नेगी ने 90.00 प्रतिशत अंको के साथ 18 वां स्थान प्राप्त किया . इंटर परीक्षा मैं भय्या दीपांशु भंडारी ने 86.20 प्रतिशत अंको के साथ 12 वां व भय्या गौरव कंडारी ने 83.80 प्रतिशत अंको के साथ 23 वां स्थान प्राप्त किया. भय्या दीपांशु भंडारी ने गणित में 100 में से 100 अंक प्राप्त किये.

हाई स्कूल परीक्षा मैं कुल 208  भय्या/बहिनों ने भाग लिया जिसमे 123 प्रथम, 65 द्वितीय व 06 तृतीय श्रेणी मैं उत्तीर्ण हुए. 14 भय्या/बहिनों अनुत्तीर्ण हुए इस प्रकार कुल परीक्षाफल 93.27 प्रतिशत रहा. प्रथम श्रेणी मैं उत्तीर्ण भय्या/बहिनों में से दो ने 90 प्रतिशत से अधिक, 20 ने  80 प्रतिशत से अधिक और 18 भय्या/बहिनों ने 75 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किये . इस प्रकार कुल 40 भय्या/बहिन सम्मान सहित उत्तीर्ण हुए.

इंटर बोर्ड परीक्षा में 227 भय्या/बहिनों ने भाग लिया जिसमे 84 प्रथम, 122 द्वितीय व 06 तृतीय श्रेणी मैं उत्तीर्ण हुए. 15 भय्या/बहिनों अनुत्तीर्ण हुए इस प्रकार कुल परीक्षाफल 93.39 प्रतिशत रहा.  प्रथम श्रेणी मैं उत्तीर्ण भय्या/बहिनों में से 07 ने  80 प्रतिशत से अधिक और 10 भय्या/बहिनों ने 75 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किये . इस प्रकार कुल 17 भय्या/बहिन सम्मान सहित उत्तीर्ण हुए.

विद्यालय परिवार की ओर से सभी भय्या/बहिनों को उनकी सफलता पर बधाइयाँ व उनके उज्जवल भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं .... 

मंगलवार, 17 मई 2011

छात्र संसद के पदाधिकारियों ने ली शपथ


 सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कालेज श्रीकोट गंगानाली की नव निर्वाचित छात्र संसद के पदाधिकारियों ने बुधवार को पद एंवं गोपनीयता की शपथ ली। प्रधानमंत्री और सेनापति समेत कुल 22 विभागों के प्रमुखों ने शपथ लेकर अपना कार्य ईमानदारी और निष्ठा से करने का वचन दिया।
कालेज परिसर में आयोजित कार्यक्रम में सरस्वती शिशु मंदिर श्रीकोट के प्रधानाचार्य रणजीत सिंह नेगी ने प्रधानमंत्री पद पर शुभम रावत और सेनापति पद पर रेखा कंडारी को शपथ दिलाई। शारीरिक एवं स्वास्थ्य परिषद, अनुशासन एवं क्रीड़ा परिषद, विज्ञान एवं पर्यावरण परिषद, साहित्य एवं सांस्कृतिक परिषद और विज्ञान एवं परीक्षा प्रमुख के पदों पर क्रमश: अभिषेक उनियाल, अंकुर बहुगुणा, श्वेता बहुगुणा, स्वाति रावत और संजय जयाड़ा ने शपथ ली। मुख्य अतिथि गढ़वाल विवि के डॉ. डीडी चौंनियाल और विद्या मंदिर इंटर कालेज श्रीकोट के प्रधानाचार्य लोकेंद्र अणथ्वाल ने सभी पदाधिकारियों को शपथ दिलाई।
डॉ. चौंनियाल ने कहा कि छात्र संसद के गठन से छात्र-छात्राओं को लोकतंत्र की विभिन्न प्रक्रियाओं को समझने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना के लिए प्रत्येक नागरिक को इसके मूलभूत कर्तव्यों और अधिकारों की समझ होनी चाहिए। कार्यक्रम का संचालन आचार्य कुलदीप सिंह नेगी किया।

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

सन्त रैदास जयंती 18 February!!


संत कुलभूषण कवि रैदास उन महान् सन्तों में अग्रणी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है। मधुर एवं सहज संत रैदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है।
प्राचीनकाल से ही भारत में विभिन्न धर्मों तथा मतों के अनुयायी निवास करते रहे हैं। इन सबमें मेल-जोल और भाईचारा बढ़ाने के लिए सन्तों ने समय-समय पर महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ऐसे सन्तों में रैदास का नाम अग्रगण्य है। वे सन्त कबीर के गुरूभाई थे क्योंकि उनके भी गुरु स्वामी रामानन्द थे
आज(२ सितम्बर २००९) से लगभग छ: सौ बत्तीस वर्ष पहले भारतीय समाज अनेक बुराइयों से ग्रस्त था। उसी समय रैदास जैसे समाज-सुधारक सन्तों का प्रादुर्भाव हुआ। रैदास का जन्म काशी में चर्मकार कुल में हुआ था। उनके पिता का नाम संतो़ख दास (रग्घु) और माता का नाम कर्मा देवी बताया जाता है। रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वे अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे।
उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे।

प्रारम्भ से ही रैदास बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया। रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे।
उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का पता चलता है। एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का मैंने वचन दे रखा है। यदि मैं उसे आज जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा। गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा ? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि - मन चंगा तो कठौती में गंगा।
रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया।
वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा। वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।
उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। अपने एक भजन में उन्होंने कहा है-
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै। तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।
उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है जबकि लघु शरीर की पिपीलिका (चींटी) इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।
रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी। इसलिए उसका श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वत: उनके अनुयायी बन जाते थे।
उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये। कहा जाता है कि मीराबाई उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी थीं।
वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की। सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।
आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्यधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।
सन्त रैदास की रचनाएँ देखने के लिए क्लिक करें http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8


मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

Basant Panchmi

Basant Panchami has a specific meaning, Basant means Spring, whereas Panchami means the fifth day of the spring. It falls on Panchami - on the Waxing Moon. The festival lies in the month of January-February. The festival is celebrated with full vivacity and festivity to mark the end of the winters. It is one of the first festivals of the Year and is celebrated all over India. The yellow color has great significance, people wear yellow clothes, offer yellow flowers in worship and put a yellow, turmeric tilak on their forehead. They visit temples and offer prayers to various gods. At home, kesar halva, also yellow in color, is prepared. The yellow flowers of mustard crop covers the entire field in such a way that it seems as if gold is spread over the land glittering with the rays of the sun.


The day of Basant Panchami is dedicated to Goddess Saraswati. Saraswati is the goddess of learning who bequeaths the greatest wealth to humanity, the wealth of knowledge. Hindu mythology depicts Saraswati as a pristine lady bedecked with white attire, white flowers and white pearls, sitting on a white lotus, which blooms in a wide stretch of water. The Goddess also holds Veena, a string-instrument, like Sitar, for playing music. The prayer of Sarasvati finally concludes as, "Oh Mother Sarasvati remove the darkness (ignorance) of my mind and bless me with the eternal knowledge."



गुरुवार, 18 नवंबर 2010

विद्यालय को लगातार दूसरे वर्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेक्षिक उत्कृष्टता पुरस्कार

सरस्वती विद्या मंदिर श्रीकोट गंगानाली को बोर्ड परीक्षाओ में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए लगातार दूसरे वर्ष भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेक्षिक उत्कृष्टता पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. देहरादून में १४ नवम्बर को बाल दिवस  पर आयोजित एक कार्यक्रम  में मुख्यमंत्री  रमेश पोखरियाल ने विद्यालय को यह पुरस्कार दिया. २००३ में हाई स्कूल की मान्यता प्राप्ति के मात्र ७ वर्षो में ही विद्यालय के २३ भय्या/बहिनों ने प्रदेश की वरीयता सूची में स्थान बनाया है . 

शनिवार, 13 नवंबर 2010

राहुल बर्त्वाल ने राज्य स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया



कक्षा   ८ के छात्र भय्या राहुल बर्त्वाल ने दिनांक १ से ३ नवम्बर तक हरिद्वार में संपन हुई राज्य स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर स्वर्ण पदक जीतकर विद्यालय का नाम रोशन किया है  भय्या राहुल बर्त्वाल को राष्ट्रीय स्तर पर भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए हार्दिक  शुभकामनायें !!!